अखिल भारतीय पुष्टिकर सेवा परिषद् का विधान

जब अखिल भारतीय पुष्टिकर सेवा परिषद् का विधान विशेष: राष्ट्रीय कार्यकारिणी की गत बैठक में माननीय सदस्यों ने अ.भा.पु. सेवा परिषद् के विधान की जानकारी हर सदस्य को देने की मांग की थी, ताकि परिषद् के अविकल भारतीय संगठन के ढांचे को पुर्नजीवित एवं सुसंगठित किया जा सके। उसी की अनुपालना में परिषद् का विधान जो कि 1969 में स्वीकृत और 2000 में संशोधित किया गया था, उसे अक्षरशः प्रकाशित किया जा रहा है। ज्ञात रहे कि इस विधान को 10 वर्ष पूर्व जून, 2001 में भी पुष्करणा सन्देश में प्रकाशित किया जा चुका है।

-डाॅ. एस.एन. हर्ष, महामंत्री, अ.भा.पु.से. परिषद्

1. नाम: इस संगठन का नाम ‘‘अखिल भारतीय पुष्टिकर सेवा परिषद्’’ होगा। जो परिषद् के नाम से वर्णित है।

2. प्रधान कार्यालय: इस परिषद् का केन्द्रीय कार्यालय जोधपुर में रहेगा।

3. अधिकृत भाषा: परिषद् की कार्यवाही हेतु इसकी अधिकृत भाषा हिन्दी होगी परन्तु अनिवार्यता के कारण अंग्रेजी में भी पत्र-व्यवहार होने पर कोई आपत्ति नहीं होगी।

4. कार्यक्षेत्र: इस परिषद् का कार्यक्षेत्र समस्त भारतवर्ष होगा पर यदि कोई पुष्टिकर बन्धु भारत के बाहर निवास करता है, तो वह स्थान भी इसके कार्यक्षेत्र में समझा जायेगा।

5. कार्यकाल: साधारणतया संगठन की सभी इकाइयों का कार्यकाल पाँच वर्ष का होगा, जिसे अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण एक वर्ष बढ़ाया जा सकता है।

6. लक्ष्य व उद्देश्य:

  1. पुष्करणा बन्धुओं के परस्पर भ्रातृभाव, सहकारिता, एकता व संगठन की भावना की स्थापना व प्रोत्साहन तथा उपर्युक्त लक्ष्य प्राप्ति हेतु समस्त भारत में परिषद् की प्रान्तीय व स्थानीय शाखाएँ स्थापित करना व उनका नियमन एवं संचालन करना।
  2. पुष्करणा बन्धुओं की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक, सांस्कृतिक उन्नति, प्रगति व कल्याण की अभिवृद्धि हेतु कार्य एवं प्रयत्न करना।
  3. उच्च व तकनीकी शिक्षा प्राप्ति हेतु साधनहीन विद्यार्थियों की तथा आपातकालीन अवस्था में जरूरतमन्द पुष्करणा-बन्धुओं की आर्थिक व अन्य सहायता करना।
  4. पुष्करणा-बन्धुओं में पारस्परिक सम्पर्क बढ़ाने, उन्हें एक-दूसरे के निकट लाने हेतु क्षेत्रीय, विभागीय व अखिल भारतीय सम्मेलन के अधिवेशन, स्नेह-मिलन, सभा-समारोह, उत्सव, मनोरंजन के लिए आम खेल-प्रतियोगिताओं आदि का आयोजन करना तथा पत्र-पत्रिकाओं व अन्य साहित्य का प्रकाशन व प्रसारण करना तथा प्रचार व प्रसार के सभी साधनों को काम में लेना।
  5. महिला-मण्डल, युवक-मण्डल, व्यावसायिक-मण्डल तथा ऐसे ही अन्य उपयोगी मण्डलों को प्रोत्साहित करना और आवश्यक साधन उपलब्ध कर, उनकी हर प्रकार से सहायता करना।
  6. परिषद् के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु विद्यालय, छात्रावास, पुस्तकालय, गौशाला, कृषिफार्म, अनुसंधानशालाओं, वृद्धआश्रम, चिकित्सालय व औषधालय आदि का संचालन करना।
  7. परिषद् व उसकी समस्त शाखाओं के बहुमुखी कार्य-कलापों को गतिमान बनाने हेतु शुल्क, दान, मनोरंजक कार्यक्रम, खेल-तमाशे व अन्य साधनों द्वारा अर्थ-उपार्जन करना एवं उसे परिषद् के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु व्यय करना।
  8. सभी अथवा आंशिक समान उद्देश्यों वाली अन्य स्व-सामाजिक, अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से अपने कार्य के सम्बन्ध में समन्वय स्थापित करना।
  9. परिषद् के लक्ष्यों व उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सम्पत्तियों, भवनों को धारण करना, खरीदना, निर्माण करवाना तथा आवश्यकता अनुसार हस्तान्तरण करना।
  10. पुष्टिकर सेवा परिषद् ऐसे कार्यक्रम भी आयोजित करेगी, जिनसे देश के नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना, उच्च मानवीय जीवन-मूल्यों के प्रति आस्था एवं भारतीय सभ्यता व संस्कृति के प्रति निष्ठा विकसित हो।

7. सदस्यता:

  1. साधारण सदस्य: पुष्करणा-समाज का कोई भी व्यस्क स्त्री व पुरुष परिषद् का सदस्य बन सकेगा, जबकि वह परिषद् के सभी नियमों का पालन स्वीकार करे व परिषद् द्वारा निर्धारित तदर्थ एवं आवेदन-पत्र लिखित रुप में अपने हस्ताक्षर सहित सम्बन्धित शाखा को प्रस्तुत करेगा।
  2. सामान्य सदस्यता के इच्छुक व्यक्ति को अपनी स्थानीय शाखा का ही सदस्य बनना होगा, जो स्वतः ही परिषद् का सदस्य बन जायेगा।
  3. साधारण सदस्यता शुल्क रु. 51/- (इक्यावन रुपये) पंचवार्षिक होगा।

8. संगठन:

(अ)

  1. संरक्षक सदस्य- जो महानुभाव परिषद् को रु. 1001/- (एक हजार एक) एकमुश्त सहायता रुप में प्रदान करेंगे, वे परिषद् के संरक्षक सदस्य कहलायेंगे। ऐसे महानुभाव परिषद् की प्रतिनिधि-सभा के स्थायी सदस्य माने जाएंगे और उन्हें साधारण सदस्य व प्रतिनिधि-सभा के सदस्य के सभी अधिकार प्राप्त होंगे।
  2. आजीवन सदस्य- जो महानुभाव परिषद् को रु. 251/- (रुपये दो सौ इक्यावन) की एकमुश्त सहायता प्रदान करेंगे, वे परिषद् के आजीवन सदस्य कहलायेंगे। उन्हें एक साधारण सदस्य के सभी अधिकार प्राप्त होंगे।

(ब) शाखा

  1. किसी भी नगर या ग्राम में कम से कम 100 सदस्य हो जाने पर परिषद् की अधिकृत उपशाखा/शाखा वहाँ पर स्थापित हो सकेगी। ग्राम छोटे हों और निकट की दूरी पर स्थित हों, तो ऐसे ग्रामों का समूह बनाकर वहाँ भी कम से कम 100 सदस्य होने पर परिषद् की अधिकृत शाखा स्थापित हो सकेगी।
  2. एक नगर/शहर में एक से अधिक शाखा-संस्थापन हेतु राष्ट्रीय अध्यक्ष को अनुमति देने का अधिकार होगा।
  3. जहाँ किसी कारणवश अधिकृत शाखा न हो, तो वहां का कोई भी बन्धु किसी भी निकटतम शाखा का सदस्य हो सकेगा।

(स) सम्बन्धित शाखाएँ- किसी भी नगर, ग्राम या ग्राम-समूह में परिषद् की अधिकृत शाखा तो एक ही होगी, परन्तु वहाँ परिषद् के लक्ष्यों व उद्देश्यों की पूर्ति समान रूप से अथवा आंशिक रूप से करवाने वाली अन्य संस्था भी परिषद् से सम्बन्धित हो सकेगी। इस प्रकार सम्बन्धित हुई शाखा को परिषद् के केन्द्रीय कार्यालय को सम्बद्धता शुल्क रु. 1275/- पंचवार्षिक देना होगा और लिखित रूप से सम्बन्धित होने हेतु आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर सम्बन्ध स्थापित करना होगा।

9. परिषद् की प्रतिनिधि: सभा का गठन निम्नोक्त प्रकार से होगा:

  1. परिषद् के संरक्षक सदस्य
  2. परिषद् के पूर्व अध्यक्ष
  3. परिषद् की प्रत्येक अधिकृत शाखा से प्रत्येक 100 सदस्यों की संख्या पर एक प्रतिनिधि इस सभा में सम्मिलित होगा, किन्तु किसी भी अवस्था में किसी भी शाखा से प्रतिनिधियों की संख्या 11 (ग्यारह) से अधिक नहीं होगी। इस संख्या में संरक्षक-सदस्य सम्मिलित नहीं समझे जायेंगे।
  4. परिषद् की शाखाओं के अध्यक्ष
  5. परिषद् के वर्तमान पदाधिकारी एवं केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य
  6. सम्बद्ध शाखा का एक प्रतिनिधि मात्र

10. कार्यकारिणी-समिति:

  1. कार्यकारिणी-समिति के सभी सदस्यों के लिए प्रतिनिधि-सभा का सदस्य होना अनिवार्य होगा।
  2. कार्यकारिणी में सामान्यतः 31 सदस्य होंगे पर, इस संख्या को किसी भी समय निर्धारित करने का अधिकार अध्यक्ष को होगा, किन्तु किसी भी स्थिति में कार्यकारिणी सदस्यों की संख्या 51 से अधिक नहीं होगी। इन सदस्यों में कम से कम 2 महिलाओं का समावेश अवश्य होगा। कार्यकारिणी-समिति के सदस्य इस प्रकार होंगे-
  • 1. अध्यक्ष एक
  • 2. उपाध्यक्ष 5 (पांच)
  • 3. महामन्त्री 2 (दो)
  • 4. मन्त्री किसी भी अवस्था में 5 (पांच) से अधिक नहीं
  • 5. अध्यक्ष का एक निजी मन्त्री
  • 6. कोषाध्यक्ष
  • 7. महिला, युवा एवं व्यावसायिक आदि प्रकोष्ठ के संयोजक (मन्त्री स्तर के)
  • 8. गठित कार्यकारिणी द्वारा विशेष कार्य के लिये सहवरित सदस्य
  • 9. आसन्न भूत कार्यकारिणी के अध्यक्ष एवं महामन्त्री
  • 10. अध्यक्ष द्वारा मनोनीत सदस्य।

संगठन को पाँच क्षेत्रों में यथा उत्तरांचल, पश्चिमांचल, पूर्वांचल, दक्षिणांचल एवं मध्यांचल में विभक्त किया जाए तथा संविधान में सृजित पाँच उपाध्यक्षों को क्षेत्र का अध्यक्ष मनोनीत किया जाए तथा सचिव क्षेत्रीय रहेंगे। इन्हें अपने क्षेत्रों में संगठन का विस्तार का स्वतन्त्र प्रभार दिया जाए तथा केन्द्रीय प्रतिनिधि सभा, कार्यकारिणी के निर्णयों की पालना में पूर्ण सहयोग करने के अतिरिक्त ये क्षेत्रवार पृथक् कार्यक्रम आयोजित करने के लिए स्वतन्त्र होंगे। ऐसे कार्यक्रमों तथा केन्द्रीय कार्यकारिणी के निर्णयों पर क्रियान्विति की सूचना समय-समय पर अध्यक्षीय कार्यालय को देते रहेंगे।

11. निर्वाचन: परिषद् की सभी इकाइयों का निर्वाचन साधराण बहुमत से होगा:

(अ) प्रतिनिधि-सभा:

  1. प्रत्येक स्थायी शाखा अपनी सदस्य संख्या के अनुसार व निर्धारित सीमा तक हर पाँचवें वर्ष अपनी साधारण बैठक में नियमानुसार मनोनीत कर अपने प्रतिनिधि, प्रतिनिधि-सभा में भेजेगी। यह मनोनयन जनवरी मास तक होना अनिवार्य होगा।

(ब) कार्यकारिणी-समिति व पदाधिकारियों का मनोनयन:

  1. कार्यकारिणी-समिति के सदस्यों व अन्य पदाधिकारियों की घोषणा परिषद् के खुले अधिवेशन की समाप्ति के दो महीने के भीतर-भीतर अध्यक्ष को कर देनी होगी।

(स) अध्यक्ष का निर्वाचन:

  1. प्रति पाँचवें वर्ष परिषद् के खुले अधिवेशन के तीन माह पूर्व प्रत्येक स्थानीय शाखा को अपने-अपने प्रतिनिधि मनोनीत कर उनके नाम परिषद् के केन्द्रीय कार्यालय को अधिकृत रूप से जनवरी मास तक भेज देने होंगे।
  2. इस प्रकार गठित नवनिर्मित प्रतिनिधि-सभा खुले अधिवेशन से पूर्व अपनी बैठक में आगामी पाँच वर्षों के लिये परिषद् के नये अध्यक्ष का निर्वाचन बहुमत से करेगी। अध्यक्ष के निर्वाचन के अतिरिक्त प्रतिनिधि-सभा परिषद् का अन्य कोई कार्य विषय-निर्वाचिनी-समिति की बैठक से पूर्व नहीं कर सकेगी।
  3. अध्यक्ष के निर्वाचन हेतु कार्यकारिणी एक निर्वाचन-अधिकारी की नियुक्ति करेगी, जिसे निर्वाचन के पूर्ण अधिकार होंगे। मतदान डाक द्वारा होगा, जिसकी सूचना एक माह पूर्व देनी अनिवार्य होगी। नोट: इस सम्बन्ध में विस्तृत नियम बनाने का पूर्ण अधिकार कार्यकारिणी समिति को होगा।

12. प्रतिनिधि-सभा के अधिकार व कर्तव्य:

  1. प्रतिनिधि-सभा परिषद् की सर्वोपरि सत्तारूढ़ समिति होगी, जिसके संरक्षण, नियमन, अनुशासन तथा निरीक्षण में सभी अधिकृत एवं सम्बद्ध स्थानीय शाखाओं व पदाधिकारियों को कार्य करना होगा।
  2. खुले अधिवेशन में स्वीकृत हुई नीति, प्रस्ताव आदि के अनुसार आगामी पाँच वर्ष के लिये कार्यक्रम स्वीकृत कर, उसे क्रियान्वित करने हेतु कार्यकारिणी को सौंपना होगा।
  3. प्रतिनिधि-सभा आवश्यकतानुसार नियम, उपनियम, परम्परा, नीति-निर्धारण आदि सभी कार्य सम्पादित कर सकेगी। जहां आवश्यकता होगी, वहां प्रतिनिधि-सभा अपने द्वारा किये गये कार्य का खुले अधिवेशन में अनुमोदन प्राप्त कर लेगी।
  4. प्रतिनिधि-सभा की बैठक पाँच वर्ष में एक बार अवश्य होगी, यह बैठक अधिवेशन वाली बैठक के अतिरिक्त होगी।
  5. प्रतिनिधि-सभा की बैठक का कोरम एक-तिहाई सदस्य रहेगा।
  6. प्रतिनिधि-सभा के एक-तिहाई सदस्यों द्वारा लिखित मांग और कार्यक्रम प्राप्त हो जाने पर, महामंत्री के लिये प्रतिनिधि सभा की बैठक बुलाना अनिवार्य होगा। पर ऐसी बैठक बुलाने की माँग करने वालों के लिये यह अनिवार्य होगा कि वे इस तरह की बैठक का अध्यक्ष द्वारा निदेशित व्यय पहले से प्रधान कार्यालय में जमा करवा दें। बैठक का स्थान अध्यक्ष द्वारा निश्चित् किया जाएगा।
  7. प्रतिनिधि-सभा की बैठक बुलाने हेतु कम से कम एक माह पूर्व लिखित सूचना व्यक्तिवार प्रेषित करना अनिवार्य होगा।

13. कार्यकारिणी-समिति के अधिकार व कर्तव्य:

  1. परिषद् की प्रतिनिधि-सभा द्वारा निर्धारित नीति, रीति के अनुसार परिषद् के कार्यों का संचालन व सम्पादन करना व प्रतिनिधि-सभा के निर्णयों को कार्यान्वित करना।
  2. परिषद् के सभी मामलों व कार्यकलापों की व्यवस्था व नियन्त्रण तथा अध्यक्ष का मार्गदर्शन।
  3. कार्यकारिणी-समिति को यह अधिकार होगा कि वह परिषद् के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु व परिषद् के कार्यों को सम्पादित करने हेतु समय-समय पर आवश्यकतानुसार उप-समितियां नियुक्त करे, उनके सदस्यों को मनोनीत करे और उन्हें समुचित शक्तियाँ प्रदान कर उनका कार्य निर्धारित करे। इन उप-समितियों में वे व्यक्ति भी सम्मिलित किये जा सकेंगे, जो कार्यकारिणी के सदस्य न हों पर उनका किसी अधिकृत शाखा का सदस्य होना अनिवार्य होगा। इन उप-समितियों का संयोजक कार्यकारिणी का सदस्य होगा।
  4. कार्यकारिणी-समिति की बैठक त्रैमासिक बुलाना अनिवार्य होगा, किन्तु दो बैठकों का अन्तराल छः माह से अधिक नहीं होगा।
  5. कार्यकारिणी-समिति की बैठक का कोरम सदस्य संख्या के एक तिहाई का होगा।
  6. कार्यकारिणी-समिति की सामान्य बैठक की सूचना कम से कम एक माह पूर्व व असाधारण बैठक की सूचना 10 (दस) दिन पूर्व देनी होगी।
  7. कार्यकारिणी-समिति के एक तिहाई सदस्यों की लिखित माँग व कार्यक्रम प्रस्तुत हो जाने पर, महामन्त्री को कार्यकारिणी की बैठक बुलानी पड़ेगी।
  8. कार्यकारिणी-समिति की बैठक भिन्न-भिन्न नगरों में सुविधानुसार आयोजित होगी। बैैठकों का स्थान अध्यक्ष के निर्णयानुसार निश्चित् किया जाएगा।

14. अध्यक्ष के अधिकार व कर्तव्य:

  1. अध्यक्षीय-कार्यालय, राष्ट्रीय अध्यक्ष के निवास नगर में रहेगा। केन्द्रीय कार्यालय का संचालन अध्यक्षीय कार्यालय से होगा तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष से संबंधित समस्त पत्राचार अध्यक्षीय कार्यालय को संबोधित किया जाएगा।
  2. अध्यक्ष नियम संख्या 10(2) में प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए कार्यकारिणी के सदस्यों व पदाधिकारियों की घोषणा करेगा। इनमें किसी समय किसी पदाधिकारी का स्थान रिक्त होने पर किसी अन्य व्यक्ति का मनोनयन कर रिक्त स्थान की पूर्ति करेगा। जिन पदाधिकारियों का इस विधान में उल्लेख है, उनके अतिरिक्त किसी पद का, जिसे वह अपने विवेक से आवश्यक समझे, निर्माण कर सकेगा, किन्तु उस पद पर कार्यकारिणी के किसी अन्य सदस्य को ही नियुक्त कर सकेगा, जिससे कि कार्यकारिणी के सदस्यों की निर्धारित सीमा का उल्लंघन न हो। इस नियमान्तर्गत अध्यक्ष परिषद् के हित में विशिष्ट सज्जनों को परामर्शदाता मनोनीत कर सकेगा।
  3. अध्यक्ष खुले अधिवेशन, प्रतिनिधि-सभा तथा कार्यकारिणी-समिति की अध्यक्षता करेगा व इन बैठकों का विधिवत् नियन्त्रण व संचालन करेगा तथा शिष्ट परम्परा बनाये रखेगा।
  4. अध्यक्ष उपर्युक्त सभी अधिवेशनों व समितियों के कार्यक्रमों की तिथियों व स्थानों का निर्णय करेगा।
  5. उपर्युक्त सभी बैठकों की कार्यवाहियों को नियमानुसार सही रूप से लिखवा कर महामन्त्री के हस्ताक्षरों के पश्चात् उनके सत्यापन हेतु उन पर हस्ताक्षर करेगा।
  6. बैठकों में मतदान होने पर दोनों ओर बराबर-बराबर मत होने की अवस्था में अपना निर्णायक मत प्रदान करेगा।
  7. किसी भी बैठक में च्वपदज व िव्तकमत औचित्य का प्रश्न उठने पर उसे निर्णय देना होगा, जो सभी सदस्यों के लिए अन्तिम रूप से मान्य होगा।
  8. वह परिषद् के केन्द्रीय कार्यालय का सम्पूर्ण कार्य, महामंत्री एवं अन्य पदाधिकारियों से, अपने नियन्त्रण में विधिवत् करायेगा।
  9. देश के अन्य सामाजिक-संगठनों द्वारा आयोजित सभाओं व समारोहों में आमन्त्रित होने पर वह स्वयं तथा अपने पदाधिकारियों व अन्य सदस्यों सहित, जैसी भी आवश्यकता हो, परिषद् का प्रतिनिधित्व करेगा।
  10. परिषद् की सभी गतिविधियों पर वह व्यवस्थात्मक व नियन्त्रणात्मक अधिकार रखेगा।
  11. परिषद् के आय-व्यय पर पूरा नियन्त्रण रखेगा। कोषाध्यक्ष के कार्य व हिसाब-बहियों की जाँच-पड़ताल करता रहेगा। हिसाब की अधिकृत लेखा-परीक्षक द्वारा जाँच करवा कर यथावश्यक आदेश देकर हिसाब की विधिवत् व्यवस्था करेगा। कार्यकारिणी-समिति व प्रतिनिधि-सभा के प्रति कोषाध्यक्ष व महामंत्री के साथ सही हिसाब के लिये अध्यक्ष की भी पूरी जिम्मेदारी होगी।
  12. परिषद् के सभी मुख्य व महत्त्वपूर्ण लेखा-पत्रों आदि सभी पत्रों पर महामंत्री व कोषाध्यक्ष के साथ-साथ वह (अध्यक्ष) भी अपने हस्ताक्षर करेगा।
  13. प्रतिनिधि-सभा के पश्चात् परिषद् की व्यवस्था की सर्वोपरि जिम्मेवारी अध्यक्ष पर है और उसे अधिकार होगा कि वह परिषद् की प्रगति, उसके हित व उसकी सुव्यवस्था हेतु कोई भी कदम उठाए।
  14. जहां कार्यकारिणी के स्तर पर अनुमोदन उपरान्त किसी कार्य को करने की व्यवस्था है, वहां आवश्यकतावश अगर कार्यकारिणी की बैठक बुलाना सम्भव न हो, तो वह कार्य राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति से किया जा सकेगा और उसका आगामी कार्यकारिणी की बैठक में अनुमोदन करवा लिया जाए।

15. उपाध्यक्ष के अधिकार व कर्तव्य:

  1. उपाध्यक्ष, अध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्ष के निर्देश पर अध्यक्ष के सभी अधिकारों एवं कर्तव्यों का प्रयोग करेगा।
  2. अध्यक्ष द्वारा किसी भी कार्य की जिम्मेदारी सौंपी जाने पर उसे सुचारु रूप से सम्पादित करेगा।
  3. अध्यक्ष को समय-समय पर आवश्यकतानुसार अपनी ओर से परामर्श देना एवं उसकी जिम्मेवारियों व कर्तव्यों के निर्वहन में सहयोग देना।

16. महामन्त्री के अधिकार व कर्तव्य:

  1. वह परिषद् के कार्यालय का अध्यक्ष के पश्चात् सर्वोपरि नियन्त्रक, व्यवस्थापक व कार्यकर्ता होगा।
  2. वह अध्यक्ष के परामर्शानुसार परिषद् की कार्यकारिणी-समिति एवं प्रतिनिधि-सभा की बैठक आमन्त्रित करेगा व उनमें उपस्थित रहेगा।
  3. वह प्रतिनिधि-सभा व कार्यकारिणी-समिति की सभी बैठकों की कार्यवाही निर्धारित पंजिका में संधारित करेगा और उन पर अपने हस्ताक्षर अंकित कर बैठक के अध्यक्ष के हस्ताक्षर कराएगा।
  4. वह परिषद्-कार्यालय में परिषद् की शाखाओं, उसके सदस्यों, उनके साथ होने वाले पत्र-व्यवहार, विविध समितियों की बैठकों की कार्यवाही व परिषद् की सम्पत्ति के रजिस्टर आदि को व्यवस्थित रीति से रखेगा।
  5. वह कार्यकारिणी द्वारा स्वीकृत आय-व्ययक के अनुसार आय की प्राप्ति करने तथा आवश्यकतानुसार व्यय की स्वीकृति देकर आय-व्यय का लेखा नियमानुसार रखवाने की व्यवस्था करेगा। उपबंधित है कि महामंत्री द्वारा व्यय की स्वीकृति की सीमा अध्यक्ष द्वारा निर्धारित की जाएगी, किन्तु वर्ष में एक बार संस्थागत कार्यों के लिये महामंत्री बिना अध्यक्ष की स्वीकृति के भी रु. 1000/- (एक हजार) तक व्यय कर सकेगा।
  6. वह कोषाध्यक्ष के हिसाब की बहियों का प्रतिमाह निरीक्षण कर उन पर अपने हस्ताक्षर करेगा और यह देखेगा कि हिसाब सही है या बहियें नियमानुसार रखी गई हैं।
  7. वह प्रतिवर्ष परिषद् के वर्षभर की कार्यवाही का प्रतिवेदन तैयार करेगा, उसे कार्यकारिणी के समक्ष रख कर सभी सदस्यों की जानकारी हेतु प्रकाशित कर वितरित करने की व्यवस्था करेगा। इसमें वर्षभर के आय-व्यय के आंकड़े भी सम्मिलित किये जाएंगे।
  8. अन्य मंत्रियों को अपनी इच्छानुसार व आवश्यकतानुसार अपना सम्पूर्ण अथवा आंशिक कार्यभार की सहमति से सौंप सकेगा व उनके कार्यों का नियंत्रण व निरीक्षण कर सकेगा।
  9. महामंत्री अपने कार्यकलापों के लिये केवल अध्यक्ष के प्रति जिम्मेवार होगा। फिर भी प्रतिनिधि-सभा, कार्यकारिणी-समिति, परामर्शदाता व अन्य पदाधिकारियों के प्रति सद्भाव, व्यावहारिकता, सहिष्णुता से उसे अपना उत्तरदायित्व निभाना होगा और समय-समय पर सही स्थिति और समस्त परिस्थितियों, प्रगति व प्रवृत्तियों से अध्यक्ष को परिषद् के प्रति जागरूक रहने में सहायता व सहयोग देना होगा।

17. मन्त्री:

  1. ये मन्त्री, अध्यक्ष अथवा महामन्त्री की इच्छानुसार उन्हें सौंपी गई जिम्मेवारी को निभाएंगे व निर्धारित कार्य को सम्पादित करेंगे।
  2. महामन्त्री की कारणवश अनुपस्थिति में मन्त्री उनके सारे कार्यों का सम्पादन करने के लिये यथासम्भव जिम्मेवार होगा।

18. कोषाध्यक्ष:

  1. वह परिषद् को प्रापत होने वाली राशि एकत्र करेगा, उसके लिये नियमानुसार रसीद देगा, हिसाब-बही में उसे जमा कर बैंक आदि में जमा कराने की व्यवस्था करेगा।
  2. अधिकृत अधिकारी द्वारा व्यय की स्वीकृति प्राप्त होने पर निर्धारित राशि का भुगतान करेगा, उसकी नियमित रसीद लेगा, उसकी प्रविष्टि लेखा-बही में करके नियमानुसार जमा-खर्च रखेगा।
  3. वह प्रतिवर्ष आय-व्यय का आंकड़ा तैयार कर कार्यकारिणी को प्रस्तुत करेगा व उसकी पुष्टि करवायेगा।
  4. प्रतिवर्ष परिषद् एवं परिषद् के मुख-पत्र के पूरे वर्ष के आय-व्यय का आंकड़ा तैयार कर आवश्यकतानुसार कार्यकारिणी व प्रतिनिधि-सभा के सम्मुख रखेगा।
  5. प्रतिवर्ष पूर्व वर्ष के आय-व्यय के आधार पर भविष्य की आवश्यकता को ध्यान में रखकर आगामी वर्ष के लिये आय-व्ययक तैयार करने में महामन्त्री व अध्यक्ष की सहायता करेगा।
  6. परिषद् की धनराशि को सुरक्षित रखने की सारी जिम्मेवारी कोषाध्यक्ष की होगी।

19. युवा प्रकोष्ठ, महिला प्रकोष्ठ एवं व्यावसायिक प्रकोष्ठ आदि:

  1. इन प्रकोष्ठों के अध्यक्षों का मनोनयन राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा किया जाएगा।
  2. इन प्रकोष्ठों के अध्यक्ष अपनी कार्यकारिणी का गठन राष्ट्रीय अध्यक्ष की स्वीकृति से करेंगे।
  3. युवा-प्रकोष्ठ का अध्यक्ष बनने हेतु आयु सीमा 25 से 40 वर्ष होगी।
  4. इन प्रकोष्ठों के अध्यक्ष को केन्द्रीय प्रतिनिधि-सभा, कार्यकारिणी के द्वारा लिये गये निर्णयों की पालना में सहयोग करना आवश्यक होगा।
  5. उक्त तीनों प्रकोष्ठों के अलावा आवश्यकता होने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा अन्य प्रकोष्ठ भी गठित किये जा सकेंगे।
  6. इन प्रकोष्ठों के अध्यक्ष संविधान-निर्देशित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के अनुसार अपनी कार्य-योजना राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देशन में कार्यकारिणी के समक्ष प्रस्तुत करेंगे तथा योजना-अनुमोदन के पश्चात् उसके क्रियान्वयन की व्यवस्था करेंगे।
  7. परिषद् की शाखाओं में भी केन्द्रीय प्रकोष्ठों की तरह उक्त प्रकोष्ठ निर्मित होंगे, जो शाखा-अध्यक्ष के निर्देशन में कार्य करेंगे।

20. मताधिकार: जिन सदस्यों में परिषद् सम्बन्धी कोई भी अपनी वचनबद्ध देय धनराशि बकाया होगी, वे न तो मतदान में और न निर्वाचन में भाग लेने के अधिकारी होंगे।

21. खुला अधिवेशन:

  1. परिषद् का खुला अधिवेशन प्रत्येक पाँचवें वर्ष समारोह के साथ मनाया जाएगा।
  2. प्रत्येक खुले अधिवेशन का निमंत्रण किसी अधिकृत शाखा द्वारा दिया जा सकेगा। वही शाखा स्वागत-समिति बनायेगी।
  3. यह निमन्त्रण अध्यक्ष द्वारा कार्यकारिणी-समिति में स्वीकृति हेतु प्रस्तुत होगा।
  4. यदि किसी कारणवश कहीं से भी निमन्त्रण प्राप्त न हो, तो कार्यकारिणी व अध्यक्ष मिलकर आवश्यक परामर्श कर, खुले अधिवेशन का स्थान निर्धारित कर सकेंगे और खुले अधिवेशन की व्यवस्था वहाँ होगी।
  5. खुले अधिवेशन में प्रस्तुत प्रस्तावों पर अभिमत व मत देने का अधिकार सब शाखा सदस्यों को बराबर होगा।
  6. खुले अधिवेशन की समाप्ति पर स्वागत-समिति के आय-व्यय से कार्यकारिणी 6 माह के भीतर अधिवेशन का सम्पूर्ण विवरण प्रकाशित करवायेगी। इसमें स्वागत-समिति के आय-व्यय के आंकड़े भी सम्मिलित होंगे।
  7. खुले अधिवेशन का पूर्ण विवरण महामंत्री कार्यकारिणी के समक्ष प्रस्तुत करेगा तथा अधिवेशन की आय में से बचत हुई हो, तो वह आयोजित करने वाली संस्था शाखा की होगी।

22. विषय-निर्वाचनी समिति:

निर्माण, अधिकार व कर्तव्य:

  1. विषय-निर्वाचिनी समिति का गठन निम्नोक्त प्रकार से होगा- (1) स्वागत-समिति का अध्यक्ष (2) स्वागत-समिति का मन्त्री (3) परिषद् का नव-निर्वाचित अध्यक्ष (4) परिषद् का भूतपूर्व अध्यक्ष तथा सभी पदाधिकारी (5) प्रतिनिधि-सभा के सदस्यगण (6) स्वागत-समिति की ओर से निर्वाचित या मनोनीत 11 सदस्यगण (7) परिषद् के नव-निर्वाचित अध्यक्ष द्वारा नामांकित अधिक से अधिक 7 (सात) सदस्य (8) कार्यकारिणी के सदस्यगण
  2. विषय-निर्वाचिनी के कर्तव्य- परिषद् की रीति-नीति निर्धारण करने वाले सभी प्रस्तावों का एकीकरण, समीकरण व समन्वय करके उनका समुचित रूप से खुले अधिवेशन में स्वीकृति हेतु प्रस्ताव करवाना।
  3. विषय-निर्वाचिनी के अधिकार- (1) परिषद् की प्रतिनिधि-सभा आदि के निर्माण, नीति आदि पर विचार। (2) जब तक कोई भी प्रस्ताव विषय-निर्वाचिनी में स्वीकृत नहीं होगा, तब तक वह खुले अधिवेशन में प्रस्तुत नहीं हो सकेगा। (3) विषय-निर्वाचिनी में यदि कोई प्रस्ताव अस्वीकृत हो जाय, तो जिस प्रस्ताव-संशोधन को एक चैथाई मत मिले हों, तो उसे पूर्वलिखित सूचना देकर, खुले अधिवेशन में रखा जा सकेगा। (4) विषय-निर्वाचिनी में स्वीकृत प्रस्ताव पर खुले अधिवेशन में अध्यक्ष की स्वीकृति से संशोधन रखा जा सकेगा, पर ऐसा संशोधन मूल प्रस्ताव के विरोध में नहीं हो सकेगा।

23. प्रतिनिधि सभा की सदस्यता से विलगता व निष्कासन:

  1. किसी भी अधिकृत शाखा को यह अधिकार होगा कि वह अपने मनोनीत प्रतिनिधि को प्रतिनिधि-सभा से विलगकर वापिस बुला ले तथा उसके स्थान पर किसी मनोनीत प्रतिनिधि को भेज दे।
  2. प्रतिनिधि-सभा के किसी भी सदस्य को, जो परिषद् के लक्ष्यों, उद्देश्यों, हितों व नियमों के विरुद्ध कार्य करेगा अथवा अशिष्ट व अशोभनीय व्यवहार करेगा, प्रतिनिधि-सभा उसके विरुद्ध अपनी बैठक में उपस्थित सदस्यों के बहुमत से अविश्वास का प्रस्ताव स्वीकृत कर प्रतिनिधि सभा से निष्कासित कर सकेगी। ऐसे प्रस्ताव की अधिकृत प्रतिलिपि महामन्त्री द्वारा सम्बन्धित स्थानीय शाखा या पदाधिकारी को भेज दी जाएगी। यह प्रस्ताव आदेशात्मक होगा और इसका पालन करना अनिवार्य होगा।

24. कार्यकारिणी-समिति के सदस्य व पदाधिकारी की विलगता या निष्कासन:

  1. कार्यकारिणी-समिति का कोई भी सदस्य अपने कार्यकाल की अवधि में सदस्यता से अध्यक्ष की इच्छा पर विलग किया जा सकेगा और अध्यक्ष को यह अधिकार होगा कि वह उसके स्थान पर किसी भी अन्य सदस्य को मनोनीत कर दे, किन्तु अध्यक्ष को ऐसा करते समय कार्यकारिणी-समिति को अपने विश्वास में लेना होगा।
  2. कार्यकारिणी का कोई भी सदस्य, जो परिषद् के लक्ष्यों, उद्देश्यों, नियमों व हितों के विरुद्ध कार्य करेगा अथवा अशिष्ट व अशोभनीय व्यवहार करेगा तो कार्यकारिणी-समिति उसके विरुद्ध अपनी बैठक में उपस्थित सदस्यों के बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव स्वीकृत कर उसे सदस्यता से निष्कासित करने की सिफारिश अध्यक्ष को करेगी, जिसका निर्णय अध्यक्ष ही करेगा।
  3. कार्यकारिणी-समिति का जो सदस्य लगातार तीन बैठकों में बिना पूर्व सूचना प्रेषित किए अनुपस्थित रहेगा, वह सदस्यता से स्वतः विलग हुआ समझा जाएगा, किन्तु अध्यक्ष की सन्तुष्टि एवं विवेकाधिकार प्रयोग करने पर विलगता क्षम्य हो सकेगी।

25. पदाधिकारी की विलगता व निष्कासन:

  1. कोई भी पदाधिकारी स्वेच्छा से त्याग-पत्र देकर अपने पद से विलग हो सकेगा किन्तु उसके त्याग-पत्र की स्वीकृति तक उसे अपने उत्तरदायित्व को निभाना होगा।
  2. यदि किसी पदाधिकारी के अवांछनीय आचरण के कारण उसे निष्कासित ही करना पड़े, ताकि अनुशासन बना रहे, तो उसके विरुद्ध आचरणहीनता प्रमाणित करना व कार्यकारिणी या प्रतिनिधि-सभा के समक्ष सारे मामले का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने की जिम्मेवारी अध्यक्ष की होगी।

26. अध्यक्ष के प्रति अविश्वास-प्रस्ताव:

  1. ऐसे प्रस्ताव की एक प्रतिलिपि कारण सहित महामन्त्री के पास प्रतिनिधि-सभा के कम से कम एक चैथाई सदस्यों के हस्ताक्षर सहित प्रस्तुत करनी होगी।
  2. कार्यकारिणी में विचार-विनिमय के पश्चात् यह प्रस्ताव प्रतिनिधि सभा की उस बैठक में रखा जाएगा, जो केवल इसी कार्य हेतु विशेष रूप से बुलाई जाएगी और जिसके लिए बैठक की तिथि की कम से कम एक माह पूर्व सूचना महामन्त्री द्वारा भेजी जाएगी।
  3. उपर्युक्त नियमाधीन बुलाई गई विशेष बैठक में विचार-विनिमय के पश्चात् उपस्थित सदस्यों में से दो-तिहाई बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में प्राप्त होने पर ही ऐसा प्रस्ताव स्वीकृत हुआ समझा जाएगा।
  4. अविश्वास-प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने की अवस्था में प्रतिनिधि-सभा को यह अधिकार होगा कि वह आगामी खुले अधिवेशन हेतु नियमानुसार अध्यक्ष के निर्वाचन तक किसी भी उपयुक्त व्यक्ति को अध्यक्ष के पद पर तदर्थ रूप से निर्वाचित कर अध्यक्ष की सारी जिम्मेवारी उसे सौंप दे।

27. अध्यक्ष का त्याग-पत्र:

  1. अध्यक्ष द्वारा अपने कार्यकाल की अवधि की समाप्ति से पूर्व ही त्याग-पत्र प्रतिनिधि सभा को प्रस्तुत करने पर उपर्युक्त सारी कार्यवाही की जाएगी।
  2. प्रतिनिधि-सभा द्वारा अध्यक्ष का त्याग-पत्र स्वीकृत होने पर ही त्याग-पत्र प्रभावी माना जाएगा।
  3. यदि अध्यक्ष अपने त्याग-पत्र देने के अन्तिम निर्णय की घोषणा कर दे, तो प्रतिनिधि-सभा को अधिकार होगा कि अध्यक्ष के रिक्त पद पर किसी अन्य योग्य व्यक्ति को निर्वाचित कर दे।
  4. यदि किसी अन्य कारण से अध्यक्ष पद का स्थान रिक्त हो जाए तो प्रतिनिधि-सभा को अधिकार होगा कि वह उसके स्थान पर किसी अन्य योग्य व्यक्ति का निर्वाचन कर दे।

28. परिषद् की निधि तथा उसका नियमन:

  1. परिषद् की सामान्य निधि निम्नोक्त रूप से निर्मित होगी- (अ) अधिकृत शाखाओं द्वारा प्रेषित सदस्यता-शुल्क का चतुर्थांश। (ब) सम्बन्धित शाखाओं का सम्बद्धता-शुल्क। (स) परिषद् के संरक्षक-सदस्यों का शुल्क। (द) कोई भी धनराशि, जो दान व अन्य वैध उपायों द्वारा परिषद् प्राप्त करे।
  2. स्थायी सुरक्षित निधि- (अ) प्रतिनिधि-सभा इस कोष के निर्माण की अधिकारिणी होगी और वह परिस्थितियों के अनुसार उपलब्ध साधनों का उपयोग करके एक ऐसी स्थायी सुरक्षित-निधि का निर्माण करेगी, जिसे उसकी पूर्व स्वीकृति के बिना, चालू-व्यय के उपयोग में नहीं लाई जा सकेगी। (ब) इस प्रकार की निधि के ब्याज का उपयोग चालू-व्यय में सामान्य कोष की रकम की भाँति किया जा सकेगा। (स) पुष्करणा-संदेश की स्थायी-निधि पर भी उपधारा (अ) व (ब) मान्य रहेगी।
  3. निधि की सुरक्षा- परिषद् को प्राप्त होने वाली सारी रकम (चालू व्यय के लिए निर्धारित रकम रु. 1000/- के अतिरिक्त) कोषाध्यक्ष को तुरन्त बैंक में परिषद् के खाते में जमा करानी होगी। बैंक में परिषद् के खाते में जमा राशि निम्नोक्त में से किन्हीं दो के हस्ताक्षर से ही आहरित की जा सकेगी- 1. अध्यक्ष 2. महामन्त्री 3. कोषाध्यक्ष किन्तु बैंक से राशि के आहरण हेतु कोषाध्यक्ष के हस्ताक्षर अनिवार्य होंगे।

29. अधिकृत कार्यवर्ष: परिषद् का कार्यवर्ष 1 अप्रेल से 31 मार्च होगा।

30. लेखा-परीक्षक: कार्यकारिणी-समिति द्वारा कोई भी अधिकृत लेखा-परीक्षक प्रतिवर्ष परिषद् के आय-व्यय की विधिवत् जाँच करने हेतु नियुक्त किया जाएगा, जो परिषद् के आय-व्यय की लेखा-जाँच नियमानुसार कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट कार्यकारिणी के समक्ष प्रस्तुत करेगा।

31. परिचालन द्वारा प्रस्तावों की स्वीकृति: कार्यकारिणी-समिति की स्वीकृति हेतु किसी भी प्रस्ताव पर अध्यक्ष की स्वीकृति से महामन्त्री डाक व पत्र-वाहक द्वारा परिचालन-पद्धति द्वारा कार्यकारिणी के सदस्यों का मत-संग्रह कर सकेगा। ऐसे प्रस्ताव पर बहुमत प्राप्त हो जाने पर वह प्रस्ताव स्वीकृत समझा जाएगा और यह निर्णय ठीक उसी प्रकार बाध्यकारी होगा, जिस प्रकार कि कोई निर्णय कार्यकारिणी-परिषद् की एक बैठक में हुआ हो, जबकि सदस्य बैठक में उपस्थित रहकर अपना मत देते हैं।

32. विधान-नियमों, उपनियमों में संशोधन: इस विधान की किसी भी धारा या उपधारा को परिवर्तित, संशोधित या परिवर्द्धित करने का अधिकार उपस्थित प्रतिनिधि-सभा के दो-तिहाई बहुमत से होगा।

33. बाध्यकारी-अधिनियम, नियम, उपनिम व प्रस्ताव: परिषद् के सभी अधिनियम, नियम, उपनियम व प्रस्ताव परिषद् के सदस्यों, विशेषकर प्रतिनिधि-सभा, कार्यकारिणी-समिति के सदस्यों व पदाधिकारियों पर बाध्यकारी होंगे।

34. दायित्व आदि: (अ) परिषद् को पूर्ण अधिकार होगा कि वह वैध उपायों द्वारा धन-संग्रह कर परिषद् के हित के लिये चल व अचल-सम्पत्ति जुटा सके। (ब) परिषद् की समस्त चल व अचल-सम्पत्ति पर सर्वाधिकार प्रतिनिधि-सभा का होगा। कार्यकारिणी, प्रतिनिधि-सभा के आदेशानुसार उसकी उचित व्यवस्था करेगी। (स) बिना कार्यकारिणी की स्वीकृति के कोई शाखा या सदस्य परिषद् के नाम पर अचल-सम्पत्ति का क्रय-विक्रय नहीं कर सकेगा। (द) परिषद् की सम्पत्ति के माने में परिषद् की प्रतिनिधि-सभा एक व्यक्ति समझी जाएगी, जो अपनी कार्यकारिणी-समिति द्वारा सजीव व सक्रिय रहेगी। (य) परिषद् के किसी भी सदस्य को परिषद् की हिसाब-बहियों का अध्यक्ष की अनुमति से निरीक्षण करने का अधिकार होगा।

35. अधिकृत शाखा-सभाओं का नियमन:

  1. प्रत्येक शाखा का यह कर्तव्य होगा कि यथा-सम्भव वह अपनी स्थानीय सभा के पूरे पाँच वर्ष के लिए सदस्य बनाए, सदस्यता शुल्क रु. 51/- (इक्यावन) एकमुश्त प्राप्त करे और उसकी एक सूची, सदस्यता-शुल्क के चतुर्थांश सहित परिषद् के केन्द्रीय कार्यालय को प्रेषित करे।
  2. प्रत्येक शाखा-सभा हर पाँच वर्ष स्तर पर भी सदस्य बना सकेगी। सदस्य से परिषद् द्वारा निर्धारित सदस्यता-पत्र केवल एक बार ही भरवाया जाएगा, पर पाँच वर्ष पश्चात् शुल्क-संग्रह करना शाखा-सभा के लिये अनिवार्य होगा। यदि 3 (तीन) महीने तक किसी सदस्य से शुल्क प्राप्त न हो, तो सदस्यता समाप्त मानी जाएगी।
  3. यदि जून के अन्त तक आवश्यक सदस्यता-शुल्क केन्द्रीय कार्यालय को प्राप्त न होगा, तो तदनुसार सदस्यता समाप्त हुई समझी जाएगी और सम्बन्धित शाखा को यह लिखित निर्देश दिया जाएगा कि वह अपनी तत्समय सदस्यता-संख्या के अनुसार अपने प्रतिनिधियों की संख्या भी घटा दे और प्रतिनिधियों का नव-मनोनयन कर आवश्यक संख्या के अनुसार प्रतिनिधि भेजे।
  4. पाँचवें वर्ष जुलाई के महीने तक में अधिकृत शाखा-सभाओं के लिए अपने पदाधिकारियों व कार्यकारिणी-समिति का निर्वाचन सम्पन्न कर, उसकी अधिकृत सूची केन्द्रीय कार्यालय को देना अनिवार्य होगा।
  5. प्रत्येक अधिकृत शाखा-सभा को अपने स्वतंत्र नियम, उपनियम आदि बनाने का पूर्ण अधिकार होगा पर यह प्रतिबन्ध होगा कि कोई भी नियम, उपनियम परिषद् के मूल सिद्धान्तों व उद्देश्यों आदि के विरुद्ध न हों।
  6. अधिकृत शाखाओं की चल-अचल सम्पत्ति पर उन्हीं का अधिकार होगा।
  7. जहाँ शाखाओं के अध्यक्षों द्वारा निर्धारित समय पर चुनाव नहीं करवाने या अध्यक्षीय कार्यालय के निर्धारित कार्यक्रमों के आयोजन में सहयोग नहीं करने या किसी रूप में किन्हीं निर्देशों की अवहेलना करने की स्थिति में, राष्ट्रीय-अध्यक्ष द्वारा उन शाखाध्यक्षों के स्थान पर अन्य पुरुष/महिला को कार्यकारी अध्यक्ष मनोनीत किया जा सकेगा तथा नवमनोनीत अध्यक्ष को शेष काल के लिए अध्यक्ष रहने या शीघ्र चुनाव करवाने के लिए निर्देश देने का अधिकार होगा।
  8. यदि कोई शाखा-सभा अपना कार्य करना बन्द कर दे और उसके पास कोई चल-अचल सम्पत्ति हो तो उसके अध्यक्ष व कार्यकारिणी के लिए यह बाध्यकारी होगा कि वह उस सुरक्षित रख, परिषद् के महामन्त्री को सूचित करे। ऐसी अवस्था में महामन्त्री का यह कर्तव्य होगा कि वह गतिरोध को दूर कर या तो पूर्व की शाखा को पुनर्गठित करे या नई शाखा का गठन कराए। पूर्व की शाखा की सम्पत्ति फिर से इस पुनर्गठित या नई गठित शाखा को सौंप दी जाएगी।
  9. विशेष परिस्थितियों में जबकि विश्वसनीय सूत्रों से किसी शाखा के हिसाब-किताब या कार्य-कलापों में अनियमितता की सूचना प्राप्त हो, तो परिषद् के महामन्त्री को सम्बन्धित शाखा के अध्यक्ष से मिलकर उस शाखा के हिसाब-किताब व अन्य कागजों की जाँच पूर्ण करने का अधिकार होगा। महामन्त्री अपनी इस जाँच का परिणाम अध्यक्ष व कार्यकारिणी के समक्ष प्रस्तुत कर उस पर आगे कार्यवाही कराने का प्रबन्ध करेगा। इस सम्बन्ध में कार्यकारिणी-समिति का जो भी निर्णय होगा, वह सम्बन्धित शाखा के लिये बाध्यकारी होगा और शाखा यदि उसे मान्यता न दे और महामन्त्री की जाँच आदि के कार्य में बाधा डाले, तो उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकेगी।
  10. प्रतिनिधि-सभा, कार्यकारिणी-समिति तथा अध्यक्ष के सभी निर्देशों का पालन करना, उनके अनुसार कार्यवाही करना, परिषद् के उद्देश्यों व लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु निश्चित् कार्यक्रम बनाकर प्रगति करते रहना, प्रत्येक शाखा-सभा का कर्तव्य समझा जाएगा।
  11. स्थानीय अधिकृत शाखा सभी मानों में सम्बन्धित स्थान पर परिषद् का पूर्व प्रतिनिधित्व करने की अधिकारिणी होगी। 36. परिषद् का मुख-पत्र: 1. परिषद् का मुख-पत्र ‘पुष्करणा-सन्देश’ होगा। 2. पुष्करणा-सन्देश का प्रकाशन केन्द्रीय कार्यालय से होगा। 3. परिषद् के केन्द्रीय कार्यालय महामन्त्री संदेश के प्रबंध-संपादक होंगे तथा प्रधान-सम्पादक, सम्पादक-मंडल एवं संबद्ध समितियों की नियुक्ति कार्यकारिणी द्वारा की जाएगी। 4. ‘संदेश’ के आय-व्ययक का हिसाब प्रबंध-संपादक द्वारा रखा जाएगा। संदेश की आय का राशि बैंक खाते में जमा रहेगी तथा प्रबन्ध संपादक, व्यवस्थापक-सम्पादक एवं प्रधान-सम्पादक में से किहीं दो के हस्ताक्षरों से निकाली जा सकेगी। व्यय का हिसाब प्रबंध-संपादक (महामंत्री) द्वारा परिषद् की कार्यकारिणी की बैठक में रखा जाएगा। 5. परिषद् की कार्यकारिणी-समिति को ही संदेश संबंधी नीति-निर्धारण का अधिकार होगा। 6. संदेश की स्थायी-निधि परिषद् के नियंत्रण में रही है, ऐसा मानकर उससे अर्जित ब्याज से व्यय किया जाएगा।

36. परिषद् के विघटन संबंधी परिस्थिति उत्पन्न होने पर उसके विघटन संबंधी निर्णय परिषद् के खुले अधिवेशन में लिया जा सकेगा।

(इस विधान अनुसार संगठन का संचालन करना है)