इतिहास
लेखक पाली-मारवाड़ निवासी
श्री मीठा लाल व्यास

ज्ञाति वृतान्त जानने की आवश्यकता-
आत्मनों ज्ञाति वृत्तान्त, यो न जानाति ब्राहम्णः।
ज्ञातीनां समवायार्थ,पृष्टः सन्मूक तां व्रजेत्ं ।।
यदि कोई भी ब्राहम्ण अपनी ज्ञाति का वृतान्त न जानता हो, तो उससे जब कभी ज्ञाति सम्बन्घी कोई भी बात पूछी जावे तो उसको लज्जित होकर मूकवत (चुप) हो जाना पड़ता है। अतः प्रत्येक को अपनी-अपनी ज्ञाति के प्राचीन ऐतिहासिक वृतान्तों से जानकार होना चाहिए।
मनुष्यों की उत्पति -
ब्राहम्णोंस्यों मुखामासोदबाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्रेश्यः, पद्भ्या्् शूद्रों अजायत ।।
सष्टिकर्त्ता ब्रहमा के मुख से तो ब्राहम्ण, भुजा से क्षत्रिय, ऊरू (जंघा) से वैश्य और पैर से शुद्र उत्पन्न हुये। यही बात मनुस्मृति के प्रथमाध्याय के 31 वे श्लोक में तथाा ऐसा ही वर्णन भागवत पुराण आदि में भी है।
मनुष्यों के चार वर्ण -
ब्रामम्णों , क्षत्रियों , वैश्यस्त्रयोवर्णा द्धिजासयः।
चतुर्थ एक जातिस्तु, शुद्रों, नास्ति तु पंचमः ।।
मनुष्यों में गुण, कर्म, स्वाभावानुसार (1) ब्राहम्ण (2) क्षत्रिय (3) वैश्य और (4) शुद्र
ये - चार ही वर्ण माने गये है। इनमें शूद्र को छोड़कर प्रथम तीन द्विज वा द्विजाति कहलाते है, क्योंकि उपनयन संस्कार द्वारा इनका दूसरा जन्म माना गया है। इनके अतिरिक्त पाँचवा वर्ण कोई नहीं है।
सम्पूर्ण ब्राहम्णों को एक समुदाय -
सृष्टयारम्भे ब्राहम्णानां, जातिरेका प्रकीर्तिता ।
सृष्टि के प्रारम्भव में तो ब्राहम्णों का एक ही समुदाय था, इस समय की भॉति जाति भेद कुछ भी नहीं था, किन्तु केवल गोत्र प्रवर-वेद-शाखा-आदि मात्र से पहचाने जाने का व्यवहार था।
ब्राहम्णों की दो सम्प्रदायें -
ततः कालान्तरें तेंषां, देशाद्भेदोद्विधाभवत
फिर बहुत समय पीछे वे लोग दूर-दूर जा बसे, उनमें जो विन्ध्याचल के उत्तरथ गौड़ देश में जा बसे तो वे गौड़ कहलाने लगें, और जोे विन्ध्याचल के दक्षिण द्रविड़ देश में जा बसे वे द्राविड़ कहलाये। इसी प्रकार उनकी उत्तरी और दक्षिणी दो सम्प्रदाये बन गई
पुष्करणा जाति संगठन का संक्षिप्त वृतान्त -
श्रीमाल पुराण का ऐतिहासिक दृष्टि से निरीक्षण करने से विदित होता है कि पूर्वकाल में भिन्न-भिन्न गोत्रों में ब्राहम्णों में से 14 गोत्र के ब्राहम्ण सैन्धवारण्य(सिन्ध देश) में भी निवास करते थें। वे उस देश के राजाओं के पुरोहित होने से सिन्ध की प्राचीन राजधानि ‘ओलोर‘ वा ‘ओरोर‘ नगरी मे विशेष संख्या में रहते थें। उन ब्राहम्णें ने अपने समूह के उपयोगी और देश के अनुकूल हो वैंसे नियम बनाकर अपने समूह की मर्यादा नियत कर ली थी। फिर वे ही ब्राहम्ण कालान्तर में ‘भीनमाल(श्रीमाल) में चले गये थें। किन्तु वहॉ के ब्राहम्णों के मत के साथ अपना मत न मिलने से वहॉ अधिक समय तक न ठहर कर पीछे लौट आये और देश कालनुसार पुराने नियमों में कुछ संशोधन करके अपी जाति मर्यादा फिर स्थिर कर ली थी। तभी से हमारी जाति का संगठन हुआ।
पुष्करणा जाति का पंचद्राविड़ों में से गुर्जर ब्राहम्णों की एक शाखा होना-
इनके पुर्वक पुर्वकाल में सैन्घवारण्य(सिन्ध देश) में रहते थें। फिर वहॉ से श्रीमाल नगर में आ गये थें, और श्रीमाल नगर गुजरात में होने से वहॉं के ब्राहमणों की ‘श्रीमाली‘ ‘पुष्करणा‘ आदि जातियों में भी गुर्जर ब्राहमणों की शाखाये मानी गई थी। पुष्करणों के पुर्वजों को कालान्तर में मारवाड़ आदि निर्जल प्रदेशों में अधिक समय तक निवास करने, तथा राजभक्त शुभचिन्तक होने से मुसलमानी अत्याचार के समय अपने-अपने यजमान व स्वामी महाराजाओं के साथ जहॉ तहॉ भटकते फिरते रहीने आदि से उनके आचार विचार कुछ शिथिलता हो गई है। तथापि इनका आचार विचार तथा खान पान आदि सदा से प्रायः द्राविड सम्प्रदाय ही के अनुकूल अब तक चला आया है। उदाहरण स्वरूप ये न तो लहसून,पलाण्डु गुजन आदि अभक्ष्य का भक्षण करते है और न हुक्का बीड़ी आदि अपेय का पान करते है। ‘ब्राहम्ण निर्णय‘ नामक पुस्तक के पृष्ठ 382 में लिखा है कि हमने अपने नेत्रों से देखा है कि पुष्करणें ब्राहम्णें खान-पान से बड़े पवित्र होते है।
ऐतिहासिक विद्वानों ने भी पुष्करणों की गणना द्राविड़ों मैं के गुर्जर ब्राहम्णों में की है। उनमें से दो एक सज्जनों का उल्लेख हम यहॉ पर कर देते है। जाति विषयक विद्वान श्रीयुत पाण्डोबा गोपालजी ने अपनी पुस्तक के पृृष्ठ संख्या 100 में , जहॉं गुर्जर ब्राहम्णों की 84 जातियों की गणना की है, वहॉ छठी संख्या पर पोकरणें (पुष्करणे) ब्राहमणों का भी नाम लिखा गया है। ऐसे ही पादरी रेवण्ड शैरिंग साहब एम.ए.एल.एल.बी. ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दूकाट्स‘ के पृृष्ठ 77 में पुष्करणे ब्राहमणों की गणना पश्चद्राविडान्तर्गत ब्राहम्णों में की है। इसी प्रकार भारतम सरकार ने सन् 1901 की मनुष्य गणना की पच्चीसबी जिल्द ‘राजपुताना सर्किल की रिपोर्ट के पृष्ठ 146 में लिखा है। पुष्करणे ब्राहमण ‘गुर्जर‘ ब्राहम्णों का एक भेद है। फिर भी उसी पुस्तक के पृष्ठ 164 में गुर्जर ब्राहम्णों की नामावली में भी पुष्करणा ब्रहमणो की गणना की है। अहमदाबाद आदि गुजरात प्रान्त में सम्पूर्ण ब्राहम्णों की चौरासी को भोजन कराने की पुरानी प्रथा अब तक चली आती है। जब कभी वहॉ ऐसा भोजन होता है तो उस भोजन मे पुष्करणे ब्राहमण भी निमन्त्रित किये जाने है और वे उस भोज में सम्मिलित होते है।
पुष्करणा जाति का श्रीमाली जाति के साथ निकट संबंध-
पुष्करणा और श्रीमाली से दोनो ही जातिया पंच द्राविडों में से गुर्जर ब्राहमणों की एक शाखा के अन्तर्गत है। इन दोनों के आचार-विचार में देशकाल के कारण कुछ-कुछ विभिन्नता हो गई है। तथापि इन दोनों का मूल आचार द्राविड साम्प्रदाय ही के अनुकूल सदा से चला आया है। इन दोनों में 14-14 छकडियों के 84-84 उपनाम है उनमें से कितने एक उपनाम एक ही है। (जैसे-गोदा, नवलखा, ठक्कुर, कपिजल, पुच्छतोडा, गौतमीया, प्रमणेचाा, जीवणेचाा, इत्यादि) इसके अतिरिक्त इन दोनों के गोत्र भी एक ही है अर्थात जिन 14 ऋषियों के नाम 14 गोत्र पुष्करणें में है, उन्ही 14 ऋषियों के नाम 14 गोत्र श्रीमालियों में भी है। इत्यादि बातों के देखने से इन दोनो के पूर्वजों का परस्पर अति निकट संबंध होना तो सिद्ध होता ही है, किन्तु श्रीमाली ब्राहमणों तो यहॉ तक मानते है कि ये दोनों मूल समुदाय (जाति) में से दो विभाग होकर हुए है। स्कन्द पुराणन्तर्गत श्रीमाल महात्म्य की एक पुस्तक ‘श्रीमाल पुराण‘ के नाम से गुजराती भाषा टीका सहित पं. जटाशंकर लीलाधर जी तथा पं. केशव जी विश्वनाथ जी नामक श्रीमाली सज्जनों ने सं.1955 में अहमदाबाद से प्रकाशित की है। उस पुस्तक के परिशिष्ट मे दिये हुए संक्षिप्त इतिहास के अन्तर्गत पृष्ठ संख्या 782 में श्रीमाली मांथी पडे़ला बीजा विभागों के नाम शीर्षक के नीचे उक्त प्रकाशकों इस प्रकार लिखा है कि - ‘‘ पुष्करणा-श्रीमाली मांथी-5000 पुष्करणा यथा कहवायछे जे सिंध देशाना ब्राहमणों गोतमनीर पूजा करवानी ना पाडवाथी पाछा सिंघ देष मां गया ते ओ सिंध पुष्करणा कहेवाया,बाकी ना पुष्करणाओं जोधपुरमां रहां तथा केटलाक गुजरात काठीयावाड तथा कच्छमां आवीने वस्रूा, पोकरणाओं पुष्करणा नो अपभंश शब्दछे।‘‘
(अक्षर गुजराती)
श्रीमाली ब्राहमणों के इस कथन की पुष्टि उपरोक्त श्रीमाल महात्म्य में के वर्णित इन दोनो जातियों के पूर्वजों के विस्तृत वृृतान्तों के मिलने से भी होती है।
श्रीमाल पुराण के प्रकाशन में अपूर्णता-
पुष्करणा ब्राहमणों के पूवजों (सैन्धवारण्य के ब्राहमणों )का तथा श्रीमाली ब्राहमणों के पूर्वजों का वृतान्त स्कन्द पुराणान्तर्गत ‘श्रीमाल माहात्म्य के विस्तार से लिखा हुआ है, उसी में से उद्घृत पुष्करणे ब्राहमणों के पूर्वजों से संबंध रखने वाले वृतान्तों का संग्रह रूप ‘पुष्करणोपाख्यान‘ नामक एक प्राचीन पुस्तक है। उक्त श्रीमाल महात्म्य के अध्यायों की संख्या 103 होना सदा से सुनने में चला आया है। किन्तु इधर उसी महात्म्य की पूर्व प्रकराणोक्त ‘श्रीमाल पुराण‘ नाम से प्रकाशित पुस्तक में केवल 75 ही अध्याय हइसे गये है। उस पुस्तक में पुष्करणें ब्राहमणों से संबंध रखने वाले कितने ही श्लोक देखने में नहीं आये, यहॉ तक कि श्रीमाल क्षेत्र में भृगु ऋषि की कन्या श्री लक्ष्मी जी का श्री भगवान के साथ विवाह हाने के उपलक्ष्य मे श्रीमाल