लोकनायक जयनारायण व्यास
मुख्यमंत्री राजस्थान, सांसद
"बन सहारा बेसहारों के लिये बन किनारा भ्रमित नावों के लिये जो जिया अपने लिये तो क्या जिया जी सके तो जी हजारों के लिये।" ऐसे विचारों के धनी थे शेर-ए-राजस्थान लोकनायक श्री जयनारायण व्यास। व्यासजी का जन्म 18 फरवरी 1899 में जोधपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में श्री सेवारामजी के यहां हुआ। मानवीय गुणों का बीजारोपण करने का श्रेय उनकी नानी को जाता है। व्यासजी बाल्यकाल से ही क्रान्तिकारी विचारों के धनी थे। समाजसेवा की भावना उनके कण-कण में बस्ती थी। उस समय समाज का रूढ़िवादिता, अंधविश्वास व मिथ्या धारणाओं की जंजीरों में झकड़ा था। महिलाओं की स्थिति समाज में उचित नहीं थी, बेटे-बेटियों में भेद किया जाता था, अतः इस ओर कदम बढ़ाने हेतु व्यासजी ने और अन्य पुष्करणों युवकों में उत्साही साथियों का दल तैयार किया। सन् 1918 ई. में अखिल भारतीय पुष्करणा महासभा का विराट अधिवेशन जोधपुर में हुआ। इसके पश्चात् 1999 में पुष्करणा युवक मण्डल का गठन किया गया। एक समाज सुधारक के रूप में उनकी एक शुरूआत थी। उन्होंने जीवन पर्यन्त इस ओर प्रयास किया। आज भी समाज में स्त्री हीन दृष्टि से देखी जाती है। व्यासजी ने आज से 92 वर्ष पूर्व स्त्री शिक्षा व स्त्री दशा के प्रति समाज को जागरूक किया। उनके अनुसार नारी समाज की नींव है। जब तक वह सजग व समझदार नहीं होगी समाज रूपी स्तम्भ गगन को छू नहीं सकता। उन्हीं शब्दों में- नासमझ रहेगी जब तक ये घरवालियां घर कचरे का दतर होगा, मकड़ी जाले घर में सब दिन रात रहेंगे, बदबू से लदी रहेगी नालियां ना समझ रहेगी जब तक ये घरवालियां। इस हेतु उन्होंने 19़32 में कन्या पाठशाला की स्थापना की जो वर्तमान में जयनारायण व्यास बालिका सीनियर माध्यमिक विद्यालय के नाम से जोधपुर में सफलतापूर्वक चल रही है। उस समय पुत्री को पुत्र की तुलना में कम महत्व दिये जाने की बात का विरोध करते हुए बड़े निर्भय शब्दों में उन्होंने कहा- बेटा-बेटी एक आवं है, फिर इण में क्यूं दूभाव है। बेटे को दो चूपड़ी चपाती, बेटी सूखी रोटी खाती। इस प्रकार व्यासजी ने सम्पूर्ण मारवाड़ के शिक्षित होने पर बल दिया। व्यासजी निर्भीक, स्पष्ट वक्ता के साथ-साथ सफल पत्रकार भी थे। इन्होंने पुष्करणा मासिक समाचार-पत्र वीर दुर्गादास-साप्ताहिक पत्र, प्रिंसली इण्डिया, आगीवाण आदि समाचार-पत्र तथा अन्य में अंग्रेजी पत्रिका पीप में सम्पादन कार्य किया। इन समाचार-पत्रों के माध्यम से इन्होंने सामन्तवाद व राजशाही के विरुद्ध अनैतिक व भ्रष्ट कारनामों के विरुद्ध कार्यवाही हेतु जनचेतना जगाने का कार्य किया। व्यासजी उत्कृष्ट साहित्यकार, गीतकार के रूप में श्रेष्ठ कलाकार भी थे। उनका व्यक्तित्व अनूठा था। व्यासजी के जीवन की नींव दिल्ली यात्रा के दौरान पड़ी। हालांकि वे उस समय राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय तो नहीं हुए थे मगर उनका दिलो-दिमाग राजनीति के रंग में रम गया था। इस क्षेत्र में उनके जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आये मगर वे घबराये नहीं। हर विकट परिस्थिति का डटकर सामना किया। ऐसे ही देशभक्तों के कारण हमारा भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ। स्वतन्त्र भारत में 3 मार्च 1948 को व्यासजी जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। इस दौरान उन्होंने विभिन्न राज्यों का एकीकरण कर मारवाड़ को राजस्थान राज्य में पिरोने का महत्वपूर्ण कार्य किया। 26 अप्रेल 1951 को व्यासजी राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए। 2 नवम्बर 1952 को व्यासजी दुबारा मुख्यमंत्री बनाये गये। 1949 से 1951 तक वे प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। दुबारा सन् 1956 में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गये। किन्तु अन्त में राजनैतिक स्तर पर तीव्रतम भेद हो जाने के कारण 1957 में इन्होंने त्याग पत्र दे दिया। 1957 तथा 1960 में व्यासजी राज्य सभा के सदस्य रहे। राष्ट्रपति द्वारा प्रथम हिन्दी आयोग के भी सदस्य रहे। इस प्रकार राष्ट्र के लिये आहुति देते हुए 14 मार्च 1963 की शाम को अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार के विरुद्ध शंखनाद फूंकने वाले श्री व्यासजी ने आँखे मूंद कर ली। इस प्रकार व्यासजी ने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र को समर्पित किया। ऐसी जिन्दादिली की मिशालें आज ढूंढने पर भी नहीं मिलती। उनके जैसे महान् सागर से विशाल व्यक्तित्व के धनी के जीवन को शब्दों में बांधना निश्चित रूप से कठिन है।