स्व.कॉ. श्री हरी कृष्ण व्यास
पूर्व विधायक जोधपुर
जोधपुर के बहुत ही कुलीन और सभ्रान्त परिवार में जन्मे कामरेड एच.के. व्यास के पास वो सब कुछ था - आसूदा विरासत, पिताजी पुलिस के डी.आई.जी., समाज में प्रतिष्ठा - जिसके पायदान पर चढते हुए वो एक समृद्ध और सुकून भरी जिन्दगी जी सकते थे जो कि हर औसतन उच्च मध्यम वर्ग के व्यक्ति की ख्वाहिष हो सकती थी। लेकिन संभवतः कामरेड व्यास के मुकद्दर में कुछ और ही लिखा था। युवावस्था की दहलीज पर आते-आते समाज में व्याप्त खोखले नैतिक मूल्य, आडम्बर, दकियानूसी सोच, बोझिल परम्पराएं, इनके खिलाफ फितरतन आवाज बुलन्द करने की उनमें ललक रहती थी। गरीबी, भुखमरी, श्रमिकों का शोषण वर्गो में विभाजित समाज, दौलत पैदा करने वाला लाचार और असहाय मजदूर, इन सबको ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिये कॉ. व्यास लाजमी तौर पर मार्क्स की रचनाओं की तरफ मुखातिब हुए और यक बयक जैसे रोषनी मिल गई। सभी संदेह दूर और सभी उत्तर मिल गये। परिवार ने ऐसे क्रांतिकारी विचारों से अलहदा करने के लिये उच्च षिक्षा के लिये उनको नागपुर भेज दिया, लेकिन वहां पर भी मार्क्स और एंजिल्स की पुस्तके व कम्युनिस्ट साहित्य उनके मुकम्मल साथी बने रहे। कुषाग्र बुद्धि व बौद्धि क क्षमता के फलस्वरूप पाठ्यपुस्तकों में उल्लिखित सामग्री एक बार उनके सहपाठी पढकर सुना देते तो वे तुरन्त ही आत्मसात कर लिया करते थे। इसलिये इम्तहान में हमेषा अव्वल ही रहे। कॉलेज के इस सफर में कामरेड ए.बी. बर्द्धन भी उनके हमसफरथे। औपचारिक रूप से दाखिला ले लिया ओर वही से शुरू हुआ पार्टी के कार्य का सिलसिला जो जीवनपर्यन्त चलता रहा। उनकी विलक्षण् क्षमता, पार्टी के प्रति समर्पण, नेतृत्व की अद्भुत कुव्वत की वजह से पार्टी की पॉलिट ब्यूरो ने राजस्थान को ही उनकी कार्यभूमि बनाने का आदेष दिया। जोधपुर में पार्टी का न केवल आगाज किया, बल्कि उसकोपरिवर्तन का एक सषक्त वाहक बना दिया। बिखरे हुए श्रमिकों को एकत्रित कर संगठित होकर अपनी जायज हकों के लिये आवाज बुलन्द करने के लिये प्रोत्साहित किया। इस कोशिश में शहर का बुद्धिजीवी वर्ग भी अछूता नहीं रह सका। बैठके होती, जन आंदोलन होता, वामपंथी विचारधारा पूरी फिजा में फैलती हुई नजर आने लगी। इस कारवां में कॉ. अशरफ फौजदार, कॉ. फतेह सिंह, कॉ. अमरचंद, कॉ. मोहन पुनमिया आदि खूब सारे शामिल हो गये और कारवां आगे बढता गया। नतीजन जोधपुर शहर विधानसभा के उपचुनाव में कॉ. एच.के. व्यास को पार्टी का उम्मीदवार चुना गया। फिजा में तैरती हुई वामपंथी लहरों ने आखिर रंग दिखा दिया और कॉ. व्यास विजयी घोषित हुए। विधानसभा में अपने जुझारू व्यक्तित्व के कारण वे विपक्ष के एकमात्र चेहरे बन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया में अंततः गये। वामपंथी विचारधारा का प्रभावी संप्रेषण एवं प्रसार के लिये वो अखबारों एवं पत्रिकाओं में अपना कॉलम लिखते रहते थे। उस समय के दिल्ली से प्रकाषित अंग्रेजी अखबार ’’पैट्रीयट‘‘ के स्थायी स्तम्भकार थे। उनकी अनूठी लेखन शैली से प्रभावित होकर पार्टी ने दैनिक अखबार ‘‘जनयुग’’ के सम्पादन का दायित्व कॉ0 व्यास को ही सौंपा जो उन्होंने अखबार के जीवनकाल तक निभाया। पार्टी को सभी कुछ समर्पित अपना व्यक्तिगत जीवन, अपनी सम्पदा, अपने नाते-रिष्तों का दायित्व, करने वाले जीवन के संध्याकाल में कई तरह की बीमारियों से जूझते हुए दिनांक 15 जून 1995 को कॉ. व्यास दुनिया को अलविदा कह गये।